इन दिनों एक बार फिर
से अंडमान-निकोबार द्वीप समूह चर्चा के केन्द्र में है।इस चर्चा की ठोस वजह भी
है।ऐसा लग रहा है कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की
कहानी जब भी कही जाएगी तो द्वीप समूह के बिना हमेशा अधूरी ही रहेगी। भारतीय
स्वतंत्रता संग्राम और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का आपस में गहरा संबंध है।
अपनी स्वतंत्रता
सबको प्यारी होती है।महानगरों में रहनेवाले तथाकथित सभ्य नागरिक हो या जंगलों में
रहनेवाले आदिवासी आदिम।अपने क्षेत्र में कोई भी अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं करता।शायद
इतनी समझ सभी को होती है।और ऐसा ही एक बार फिर अंडमान- निकोबार में देखने को मिला।
जब एक विदेशी के द्वारा स्थानीय वासिंदो के अस्मिता का अतिक्रमण करने की कोशिश की
गई।
निकोबार के सेंटिनल
द्वीप में अमेरिकी पर्यटक का जबरन प्रवेश स्थानीय लोगों की स्वतंत्रता का अतिक्रमण
था।
स्थानीय मछुआरों की
मदद से 27 वर्षीय अमेरिकी पर्यटक जॉन एलेन चाऊ इसके प्रतिबंधित इलाके में जा घूसा
था।
इसके बाद उस अमेरिकी
पर्यटक पर अपने परंपरागत हथियारों से आदिवासियों ने हमला कर दिया।इस हमले में चाऊ
को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
गौरतलब हो कि जारवा
आदिवासी मानव सभ्यता की सबसे पुरानी जरजातियों में से एक है,जो हिंद महासागर के
टापूओं पर 5000 हजार सालों से रह रहे थे। इस जनजाति समूह ने कभी भी बाहरी दूनियां
से संपर्क साधने की कोशिश नहीं की।
इस जनजाति की गहराई
से अध्ययन करने वाले मानवशास्त्री बताते है कि जरवा आदिवासियों ने अभी तक आग लगाना
नहीं सिखा।खान-पान के मामले में पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर हैं।इस समाज में कोई
मुखिया नहीं होता।लेकिन हुनरमंद लोगों की कद्र की जाती है।इसके चलते जारवा आदिवासी
अपने बच्चों को तीर-भाला आदि चलाने के लिए प्रशिक्षित करते है।
इस पूरी घटना में
तीन घटक शामिल है। पहला अमेरिकी पर्यटक चाऊ,दूसरा स्थानीय मछुआरा और तीसरा अपनी
संस्कृति औऱ सभ्यता को बचाने के लिए संघर्ष करता एक मानव सभ्यता।
अंग्रेजों का भारत
में आगमन एक व्यापारी के रूप में हुआ।इसके बाद उन्होंने स्थानीय लोगों को लालच और
प्रलोभन देकर आपस में मिला लिया।
फिर भारत को अपने
आधीन करने का खेल शुरु हुआ।कुछ इसी तरह का ताना-बाना इस घटना के पीछे भी
है।तरह-तरह का भेष धारण कर विदेशी आते हैं और दूर दराज के जंगलों में रहने वाले
सीधे-साधे इंसान का धर्मातंरण करवाते हैं।इसके लिए ये धूर्त लोग छल का सहारा लेने
से नहीं चुकते।
कुछ इसी तरह का
सेंटिनेल द्वीप पर भी होने वाला था।वह अमेरिकी स्थानीय मछुआरे की मदद से वहां तक
पहुंचा।जारवा समुदाय के लोग बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं रखते।और किसी बाहरी को
संपर्क साधने देते हैं।अगर कोई वहां पहुंचने की कोशिश करता है तो यह कबीला उसके
ऊपर जानलेवा हमला कर देता है।
लेकिन जारवा समुदाय
के इस आक्रमकता में बर्बरता नहीं होता।यह शेष दुनियां के साथ अपनी आस्मिता और
स्वतंत्रता को बचाये रखने की जद्दोजहद है।स्वयं को सभ्य कहने वाले समाज को ऊनकी
आस्मिता का सम्मान करना चाहिए।
Comments
Post a Comment