जाति की गाड़ी और सुशासन का पहिया.....
जाति की गाड़ी और सुशासन का पहिया.....
आजादी के इतने सालों के बाद भी व्यवस्था लाख दावे करें लेकिन वह जाति व्यवस्था को कमजोर नहीं कर सकी हैं।अगर दूसरे शब्दों में कहा जाये तो व्यवस्था ही जाति आधारित राजनीति की अप्रत्यक्ष रूप से पोषक है।समय के साथ यह व्यवस्था धीरे-धीरे विघटनकारी होता जा रहा है।
दुर्भाग्य से यह देश के कई राज्यों में अपनी पैर जमा चुका है।बिहार भी उन राज्यों में से एक है।बिहार की राजनीति में जाति-व्यवस्था इतना घूलमिल गया है कि कोई भी नीति और रणनीति जाति और वर्ग को ध्यान में रख कर बनाया जाने लगा है।
इस राजनीति के पुरोधा बनके उभरे हैं-सुशासन बाबू ।पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने पिछड़ा वर्ग के अंदर अतिपिछड़ा और दलित वर्ग के अंदर महादलित वर्ग बना डाला। शासन का बागडोर जो उनके हाथों में है।इसलिए सशक्तिकरण के नाम पर चाबूक चला रहे हैं।सबका समय आता है अभी इनके सितारे बुलंद है।इसलिए जीन निकल रहे हैं।जब समय लदेगा तब जाएंगे तिहाड़ में बिहार करने के लिए।
इस दौर में एक कड़ी और जुड़ गया है। स्थिति यह है कि आर्थिक सशक्तिकरण के नाम पर वर्ग-विशेष को ध्यान में रख कार्यक्रम बनाया गया है।अभी हाल में ही बिहार सरकार ने ग्रामिण क्षेत्रों में परिवहन व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिए मुख्यमंत्री ग्राम परिवहन योजना की घोषणा की।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देशय ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन व्यवस्था को सर्वसुलभ करना बताया गया है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि इस कार्यक्रम से कमजोर वर्गों के बेरोजगार युवक-युवतियों के लिए रोजगार का सृजन करने में सहायता मिलेगा।
अब प्रश्न उठता है कि बेरोजगारी समुदाय विशेष को ही प्रवाहित नहीं करती है, इस रोग का बस एक ही ईलाज है और वह है रोजगार मुहैया कराना।
खैर जो भी हो आने वाले समय में यह देखना लाजमी होगा कि यह कार्यक्रम कितना सफल होता है।ग्रामीण परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करने के नाम पर सरकारी खजाने के लूट का जरिया न बन जाए।
दुर्भाग्य से यह देश के कई राज्यों में अपनी पैर जमा चुका है।बिहार भी उन राज्यों में से एक है।बिहार की राजनीति में जाति-व्यवस्था इतना घूलमिल गया है कि कोई भी नीति और रणनीति जाति और वर्ग को ध्यान में रख कर बनाया जाने लगा है।
इस राजनीति के पुरोधा बनके उभरे हैं-सुशासन बाबू ।पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने पिछड़ा वर्ग के अंदर अतिपिछड़ा और दलित वर्ग के अंदर महादलित वर्ग बना डाला। शासन का बागडोर जो उनके हाथों में है।इसलिए सशक्तिकरण के नाम पर चाबूक चला रहे हैं।सबका समय आता है अभी इनके सितारे बुलंद है।इसलिए जीन निकल रहे हैं।जब समय लदेगा तब जाएंगे तिहाड़ में बिहार करने के लिए।
इस दौर में एक कड़ी और जुड़ गया है। स्थिति यह है कि आर्थिक सशक्तिकरण के नाम पर वर्ग-विशेष को ध्यान में रख कार्यक्रम बनाया गया है।अभी हाल में ही बिहार सरकार ने ग्रामिण क्षेत्रों में परिवहन व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिए मुख्यमंत्री ग्राम परिवहन योजना की घोषणा की।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देशय ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन व्यवस्था को सर्वसुलभ करना बताया गया है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि इस कार्यक्रम से कमजोर वर्गों के बेरोजगार युवक-युवतियों के लिए रोजगार का सृजन करने में सहायता मिलेगा।
अब प्रश्न उठता है कि बेरोजगारी समुदाय विशेष को ही प्रवाहित नहीं करती है, इस रोग का बस एक ही ईलाज है और वह है रोजगार मुहैया कराना।
खैर जो भी हो आने वाले समय में यह देखना लाजमी होगा कि यह कार्यक्रम कितना सफल होता है।ग्रामीण परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करने के नाम पर सरकारी खजाने के लूट का जरिया न बन जाए।
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