अपलक देखता
अपनी ही हथेलियों को,
लगाता बरबाद लम्हों का
हिसाब-किताब
अपनी ही हथेलियों को,
लगाता बरबाद लम्हों का
हिसाब-किताब
और गहरी हो गईं लकीरे
तुम्हारे याद की तरह ।
तुम्हारे याद की तरह ।
रेत पर रखता हूँ हथेलियां,
निशान छोड़ जाती हैं ।
निशान छोड़ जाती हैं ।
बिल्कुल वैसे,जिस तरह
तुम्हारे जाते कदमों को देखकर
आँखों के कोर पर पसरे थे निशान ।
तुम्हारे जाते कदमों को देखकर
आँखों के कोर पर पसरे थे निशान ।
मैं आज भी वही खड़ा हूँ
जहाँ से लौटते वक़्त
तुमने पलटना
नही समझ मुनासिब ।
मेरा इंतजार भी लकीरों की तरह बस गहरा हो रहा ।
जहाँ से लौटते वक़्त
तुमने पलटना
नही समझ मुनासिब ।
मेरा इंतजार भी लकीरों की तरह बस गहरा हो रहा ।
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