क्या वाकई में देश बदल रहा है.....
समय का संयोग देखिए !एक तरफ जहां नारी शक्ति की उपासना का महानपर्व शारदीय मनाया जा रहा है. वहीं दूसरी तरफ अबला समझने जाने वाली भारतीय नारियों ने पुरूष की भोगवादी मानसिकता के विरुध जंग छेड़ रखा है.रोज-रोज नए खुलासे हो रहे हैं.जो लोग कभी नारी सम्मान और गरिमा की बात करते थे,वो नारी शोषण का सिर-मोड़ बनकर उभर रहे हैं.
विडबंना देखिए जिस समय यह हो रहा है,देश शारदीय नवरात्रा की धूम में लीन है.पूरा का पूरा देश नारी शक्ति का ही उपासना कर रहा है.लेकिन यहां जरा ठहरिए और सोचिए आखिर यह शक्ति है क्या ? कुछ लोग कहते हैं कि साहसपूर्ण ढंग से जीवन जीने की कला को ही शक्ति कहा जाता है.कुछ अर्थों में देखें तो उनका यह मत सही भी लगता है.लेकिन इसके उलट शक्ति का एक कुरूप चेहरा भी है जो सद्चरित्रता का लिबास ओढ़े आस-पास ही होता है.वो हमारे मित्र,मेंटर या बॉस के रुप में हो सकता है.
देश में शुरु हुए इस मीटू कैंपेन को एक सकारात्मक पहल के रुप में देखा जाना चाहिए.देर से ही सही भारतीय नारी शोषण के विरुध अपनी आवाज को बुलंद करने लगी है.हालांकि महिलाओं के इस पहल को पुरुषवादी मानसिकता वाले विरोध कर रहे है. इस कैंपेन की शुरुआत हॉलीवुड से हुई है.और अब यह कैंपेन हजारों मिल का रास्ता तय कर बॉलीवुड में आ धमका है,जिस कारण कई नामदार चेहरों के होश ऊड़ गय हैं.इस कैंपेन ने धमाका भी ऐसा किया कि नाना पाटेकर और आलोकनाथ की बोलती ही बंद हो गई.
भारत में इस कैंपेन का तहलका मचाने का श्रेय तनु श्री को जाता है.लेकिन यह भी सच है कि तनुश्री से पहले भी कई बार अन्य अभिनेत्रियों ने अपनी आवाज बुंलद की थी.लेकिन उनकी आवाज मुखर नही हो पाई.
इन सब के बीच सदी के महानायक ने जो तनुश्री-नाना पाटेकर प्रकरण पर जो कहा वो किसी हस्यासपद जोक्स से कम नहीं. उनका मत उनकी दुरदर्शिता और गरिमा को दिखाता है. कल को अगर महिला सशक्तिकरण का ब्रांड एंबासडर बन कर बड़ी-बड़ी बातें करें तो इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए.
स्थापित क्षेत्र में किसी भी नवांगतुक के लिए अपनी पैठ बनाना आसान काम नहीं होता.चाहे वो क्षेत्र अभिनय,शिक्षा,या पत्रकारिता का ही क्यूं न हो...
मानसिक सबलता तो विरले ही मिल पाता है.अगर उस समय अपने वरिष्ठ से बात किजिए तो उनका कथन होता है कि ये सब तो चलता है.मतलब वो कौटिल्य और मैकियावेली के मत से प्रवाहित होते है. और उनका महानतम सलाह होता है कि साध्य प्राप्त होना चाहिए,साधन चाहे कैसे भी हो...
हजारों सालों की संस्कृति को दरकिनार कर देते हैं.उस महान विचार को नकार देते हैं जिसमें साधन के प्राप्त करने के लिए साधनों की शुचिता और पवित्रता पर विशेष बल दिया गया है.
कुछ ऐसे भी तर्क इस कैंपेन को लेकर दिये जा रहे हैं कि खजुराहों के इस देश में नया क्या है ?उनकों थोड़ा समझना चाहिए कि खजुराहों में जो दिखाया गया है उसमें पाशविकता नहीं है.
वर्तमान कालखंड में देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है,जिसमें सभी को समान अधिकार मिले हैं. बेटियां अब बेटों से कम नहीं... आने वाले समय में यह मीटू कैंपेन और कितने सफेदपोश चेहरे को उजागर करता है.यह समय तय करेगा.
अंत में बस इतना ही कहना चाहेंगे कि अब वाकई में देश बदल रहा है.....सोच बदल लीजिए साहब...
समय का संयोग देखिए !एक तरफ जहां नारी शक्ति की उपासना का महानपर्व शारदीय मनाया जा रहा है. वहीं दूसरी तरफ अबला समझने जाने वाली भारतीय नारियों ने पुरूष की भोगवादी मानसिकता के विरुध जंग छेड़ रखा है.रोज-रोज नए खुलासे हो रहे हैं.जो लोग कभी नारी सम्मान और गरिमा की बात करते थे,वो नारी शोषण का सिर-मोड़ बनकर उभर रहे हैं.
विडबंना देखिए जिस समय यह हो रहा है,देश शारदीय नवरात्रा की धूम में लीन है.पूरा का पूरा देश नारी शक्ति का ही उपासना कर रहा है.लेकिन यहां जरा ठहरिए और सोचिए आखिर यह शक्ति है क्या ? कुछ लोग कहते हैं कि साहसपूर्ण ढंग से जीवन जीने की कला को ही शक्ति कहा जाता है.कुछ अर्थों में देखें तो उनका यह मत सही भी लगता है.लेकिन इसके उलट शक्ति का एक कुरूप चेहरा भी है जो सद्चरित्रता का लिबास ओढ़े आस-पास ही होता है.वो हमारे मित्र,मेंटर या बॉस के रुप में हो सकता है.
देश में शुरु हुए इस मीटू कैंपेन को एक सकारात्मक पहल के रुप में देखा जाना चाहिए.देर से ही सही भारतीय नारी शोषण के विरुध अपनी आवाज को बुलंद करने लगी है.हालांकि महिलाओं के इस पहल को पुरुषवादी मानसिकता वाले विरोध कर रहे है. इस कैंपेन की शुरुआत हॉलीवुड से हुई है.और अब यह कैंपेन हजारों मिल का रास्ता तय कर बॉलीवुड में आ धमका है,जिस कारण कई नामदार चेहरों के होश ऊड़ गय हैं.इस कैंपेन ने धमाका भी ऐसा किया कि नाना पाटेकर और आलोकनाथ की बोलती ही बंद हो गई.
भारत में इस कैंपेन का तहलका मचाने का श्रेय तनु श्री को जाता है.लेकिन यह भी सच है कि तनुश्री से पहले भी कई बार अन्य अभिनेत्रियों ने अपनी आवाज बुंलद की थी.लेकिन उनकी आवाज मुखर नही हो पाई.
इन सब के बीच सदी के महानायक ने जो तनुश्री-नाना पाटेकर प्रकरण पर जो कहा वो किसी हस्यासपद जोक्स से कम नहीं. उनका मत उनकी दुरदर्शिता और गरिमा को दिखाता है. कल को अगर महिला सशक्तिकरण का ब्रांड एंबासडर बन कर बड़ी-बड़ी बातें करें तो इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए.
स्थापित क्षेत्र में किसी भी नवांगतुक के लिए अपनी पैठ बनाना आसान काम नहीं होता.चाहे वो क्षेत्र अभिनय,शिक्षा,या पत्रकारिता का ही क्यूं न हो...
मानसिक सबलता तो विरले ही मिल पाता है.अगर उस समय अपने वरिष्ठ से बात किजिए तो उनका कथन होता है कि ये सब तो चलता है.मतलब वो कौटिल्य और मैकियावेली के मत से प्रवाहित होते है. और उनका महानतम सलाह होता है कि साध्य प्राप्त होना चाहिए,साधन चाहे कैसे भी हो...
हजारों सालों की संस्कृति को दरकिनार कर देते हैं.उस महान विचार को नकार देते हैं जिसमें साधन के प्राप्त करने के लिए साधनों की शुचिता और पवित्रता पर विशेष बल दिया गया है.
कुछ ऐसे भी तर्क इस कैंपेन को लेकर दिये जा रहे हैं कि खजुराहों के इस देश में नया क्या है ?उनकों थोड़ा समझना चाहिए कि खजुराहों में जो दिखाया गया है उसमें पाशविकता नहीं है.
वर्तमान कालखंड में देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है,जिसमें सभी को समान अधिकार मिले हैं. बेटियां अब बेटों से कम नहीं... आने वाले समय में यह मीटू कैंपेन और कितने सफेदपोश चेहरे को उजागर करता है.यह समय तय करेगा.
अंत में बस इतना ही कहना चाहेंगे कि अब वाकई में देश बदल रहा है.....सोच बदल लीजिए साहब...
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