शुरु से ही बिहार की
राजनीति में जातीय समीकरणों का बोलवाला रहा है।लग रहा है कि यह परंपरा एक कदम और
बढ़ने वाला है।बिहार NDA के घटक दलों के बीच 2019 जीतने को लेकर फॉर्मूला
तय हो गया है।बीजेपी और जदयू 16-16 सीटों पर जबकि सहयोगी पार्टीयां लोजपा 6 और
रालोसपा 2 सीटों पर लड़ेंगी 2019 का चुनावी दंगल। हालांकि 2014 के मुकाबले 2019 का
चुनाव जीतना NDA के लिए आसान नहीं होगा। नेताबिहीन विपक्ष थोड़े
समय के लिए हमलावर होकर असहज हो जाता है।
इसका सबसे बड़ा कारण
बिहार में फिलहाल नीतीश के कद के बराबर कोई दूसरा नेता नहीं।बिहार को विकास के
पटरी पर लाने के बाद समाज सुधार के क्षेत्र में कई उल्लेखनीय कार्य किये
हैं।दहेजबंदी और शराबबंदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।शराबबंदी से एक नए शराबमाफिया
वर्ग का उदय हुआ है। लेकिन समाज के निचले पैदान पर रहने वाले लोगों के घरों में
आर्थिक खुशहाली आई है।बिहारवासियों को जगंलराज्य की भयावता से ऊबर में लंबा समय
लगेगा।जमीनीस्तर पर बिहार की जनता मानती है कि जबतक बिहार में नीतीश कुमार
मुख्यमंत्री रहेंगे तबतक बिहार में बहार रहेगा।
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