लोकतंत्र में संख्या बल का महत्व है.अगर हम होते तो गूंज हमारी भी सुनाई पड़ती...


थावरचंद गेहलोत साहब सुनों हमारी....
थावरचंद गेहलोत साहब  केन्द्र सरकार में सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्री हैं.जैसा कि मंत्रालय के नाम से ही स्पष्ट है कि ये साहब लाचार और असहाय लोगों के सशक्तिकरण का बीड़ा अपने कंधों पर ढोह रहे हैं.पहली बार साहब को सुनने का मौका मिला.इसलिए सभी ज्ञानचक्षुओं को मैंने पहले ही साफ-सुथरा कर कर खोल रखा था.
अवसर था सामाजिक न्याय अधिकारिता विभाग की ओर से दिव्यांगजनों के लिए कैंप का उद्घाटन का.एक पल तो ऐसा लगा कि गेहलोत साहब ने भी फेंकने में PHD कर रखा है.उन्होंने कहा कि शारीरिक रूप से विकलांग समझ उपेक्षा नहीं की जा सकती.इसका सीधा-सीधा अर्थ निकलता है कि साहब भी स्वीकार कर रहे हैं कि विकलांग जन उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं.आपने तो साहब बिल्कुल दुखती नब्ज पर हाथ रख दिया. आंख में धूल झोकने का खेल ही तो हो रहा है,नहीं तो हम भी आदमी काम के थें
अब तक सशक्तिकरण के नाम पर तुष्टिकरण ही हुआ है.समानभूति की जगह सहानभूति ही मिला...
अगर अवसर मिलता तो कई लोग एवरेस्ट फतह कर जाते.आप बोल रहे हैं कि विकलांग जन को सुविधा मिले तो वो अपनी काबीलियत साबित कर सकते हैं,साहब वहीं सुविधा तो नहीं मिल पा रहा है.आपने अक्षयवट राय स्टेडियम आने-जाने के क्रम में नहीं देखा कि विकलांग जनों को कितनी असुविधा होती होगी...अब तक कितनों सरकारी और गैर-सरकारी भवन विकलांग जन के अनुकूल है.अगर फुर्सत होता तो देख लेते कि कहां- कहां रैम्प और लिफ्ट की सुविधा उपलब्ध है.जरा उनका अवलोकन कर लेते.
कुछ ट्रायसाइकिल और अन्य सहायक उपकरण का वितरण कर आपन् भी तो सिर्फ खाना पूर्ति ही किया.जरा सोचिए  कि महिला आयोग का जिम्मा एक पुरूष के हाथों में क्यूं नहीं दिया जा सकता ?एससी-एसटी के भविष्य का जुम्मा एक ब्राह्मण को क्यूं नहीं...आखिर क्या कारण है कि विकलांगों के लिए काम करने वाली संस्थाओं का जिम्मा एक सामान्य इंसान के हाथ में...लूटने के लिए साहब.....
आपकी सरकार ने विकलांग को दिव्यांग बना दिया.विकलांगों की श्रेणी को 07 से 21 कर दिया.आप इतना बताने का कष्ट करेंगे कि सुविधाओं में कितनी गुणी बढ़ोत्तरी किया.दिव्यांगजनों के दी जाने वाली सुविधाओं में भी भारी अंतर है साहब...कई राज्यों में आर्थिक सहायता के रुप में दी जाने वाली रकम में भारी अंतर है.कई योजनाओं का लाभ 80% विकलांगता होने पर ही मिल पाती है उनका क्या जो इससे कम है.
लोकतंत्र में संख्या बल का महत्व है.अगर हम होते तो गूंज हमारी भी सुनाई पड़ती...

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